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योग और भोजन का गहरा संबंध: साधना में आहार का महत्व

क्या आप जानते हैं कि आपकी थाली में रखा खाना आपकी मानसिक शांति और योग साधना को बदल सकता है? जानिए सात्विक, राजसिक और तामसिक आहार का असली सच और मिताहार का नियम जो आपकी जिंदगी बदल देगा।योग और भोजन का गहरा संबंध: साधना में आहार का महत्व

साधना विज्ञान

Rajesh Kumar

5/20/20261 मिनट पढ़ें

योग और भोजन का गहरा संबंध: साधना में आहार का महत्व
योग और भोजन का गहरा संबंध: साधना में आहार का महत्व

नमस्ते दोस्तों! आज हम एक ऐसी चीज़ पर बात करने वाले हैं, जो हम रोज करते हैं—खाना खाना। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जो रोटी या सब्जी आप अपनी थाली से उठाकर मुंह में डाल रहे हैं, उसका आपके दिमाग और आपकी मानसिक शांति से क्या रिश्ता है?

अक्सर जब लोग 'योग' शब्द सुनते हैं, तो उनके दिमाग में तरह-तरह के आसन, टेढ़े-मेढ़े शरीर और सुबह-सुबह पार्क में बाबा रामदेव की तरह सांसें खींचने की तस्वीरें आने लगती हैं। लेकिन सच बताऊं? योग सिर्फ़ चटाई (मैट) पर बैठकर हाथ-पैर हिलाने का नाम नहीं है। यह तो एक पूरी जीवनशैली है, और इस जीवनशैली का एक बहुत बड़ा हिस्सा हमारी रसोई से होकर गुज़रता है।

मैंने देखा है कि आजकल लोग जिम जाते हैं, योगा क्लास ज्वाइन करते हैं, लेकिन बाहर निकलते ही बर्गर या छोले-भटूरे पर टूट पड़ते हैं। फिर शिकायत करते हैं कि "यार, योग करने के बाद भी मन शांत नहीं रहता।" भाई, गाड़ी में केरोसिन डालकर आप बुगाटी जैसी रफ़्तार और स्मूथनेस की उम्मीद कैसे कर सकते हैं?

आइए अब जानते हैं कि आखिर योग और हमारे भोजन का यह कनेक्शन इतना गहरा क्यों है।

जैसा अन्न, वैसा मन: यह सिर्फ एक कहावत नहीं है

बचपन में हमारी दादी-नानी अक्सर कहती थीं—"जैसा खाओगे अन्न, वैसा होगा मन।" तब तो यह बात एक कान से सुनकर दूसरे से निकाल दी जाती थी। लेकिन जहां तक वास्तविकता की बात है, इस बात में सौ फीसदी सच्चाई है।

सोचिए, जब आप किसी संडे की दोपहर को भारी-भरकम कड़ाही पनीर, बटर नान और लस्सी पी लेते हैं, तो उसके बाद आपका क्या करने का मन करता है? क्या आपका मन करता है कि आप बैठकर भगवद्गीता पढ़ें या कोई मुश्किल योगासन करें? बिलकुल नहीं। आपका मन करता है कि बस चादर तानकर सो जाएं। इसे ही योग की भाषा में 'तमो गुण' या सुस्ती कहा जाता है।

इसके उलट, जब आप हल्का, ताज़ा और सादा खाना खाते हैं, तो शरीर में एक अलग ही फुर्ती रहती है। मुझे याद है, पिछले साल जब मैंने लगातार एक महीने तक सुबह के नाश्ते में सिर्फ़ ताजे फल और भीगे हुए बादाम खाने शुरू किए, तो मुझे दोपहर में आने वाली वो भयानक सुस्ती महसूस होना बंद हो गई। मेरा दिमाग ज़्यादा साफ़ तरीके से काम करने लगा। यही वह स्थिति है जिसे योग में 'सत्व' कहा जाता है, जहां आपका मन शांत और केंद्रित होता है।

योगिक आहार के तीन स्तंभ: सत्व, रजस और तमस

हमारे योग शास्त्रों में भोजन को उसकी प्रकृति और हमारे शरीर-मन पर पड़ने वाले असर के आधार पर तीन हिस्सों में बांटा गया है। इसे समझना बहुत आसान है, कोई रॉकेट साइंस नहीं है।

1. सात्विक भोजन: शांति और ऊर्जा का स्रोत

यह वह खाना है जिसे योग में सबसे बेस्ट माना गया है। इसमें ताजे फल, हरी सब्जियां, अंकुरित अनाज (स्प्राउट्स), मेवे, दूध और घी शामिल हैं। यह भोजन बिना ज्यादा तामझाम के, कम मसालों में प्यार से बनाया जाता है।

मेरे अनुभव में आया है कि जब आप सात्विक खाना खाते हैं, तो आपके विचार अपने आप शांत होने लगते हैं। शरीर हल्का रहता है, जिससे ध्यान लगाना या प्राणायाम करना बहुत आसान हो जाता है। यह खाना आपको आलस नहीं, बल्कि एक शांत ऊर्जा देता है।

2. राजसिक भोजन: बेचैनी और उत्तेजना का कारण

अब बात करते हैं राजसिक भोजन की। इसमें बहुत ज्यादा तीखा, चटपटा, तला-भुना, चाय, कॉफी और तेज मसालों वाला खाना आता है।

अगर आप बहुत ज्यादा राजसिक भोजन करते हैं, तो आपका मन हमेशा भागता रहेगा। मान लीजिए आप शाम को ध्यान लगाने बैठे, लेकिन दिमाग में चल रहा है कि कल ऑफिस में बॉस को क्या जवाब देना है, या उस दोस्त से बदला कैसे लेना है। राजसिक भोजन आपके अंदर इच्छाएं और बेचैनी बढ़ाता है। साधना के रास्ते पर चलने वालों के लिए इसे थोड़ा कम करने की सलाह दी जाती है।

3. तामसिक भोजन: आलस और अंधकार का जाल

इस केटेगरी में आता है बासी खाना, पैकेट बंद चीजें, फास्ट फूड, मांस-मछली और शराब। ऐसा खाना जिसे पचाने में शरीर की पूरी एनर्जी ख़त्म हो जाती है।

तामसिक भोजन करने के बाद शरीर भारी हो जाता है और दिमाग सुस्त। योग साधना तो दूर, इंसान अपने रोज के जरूरी काम भी टालने लगता है। अगर आप सुबह 5 बजे उठकर योग करना चाहते हैं, और रात में आपने पिज्जा और कोल्ड ड्रिंक का सेवन किया है, तो यकीन मानिए, सुबह अलार्म बजने पर आपका हाथ सिर्फ़ 'स्नूज़' बटन पर ही जाएगा।

साधना में सही भोजन क्यों जरूरी है?

मेरे प्यारे दोस्तों, जब हम योग या ध्यान करते हैं, तो हम अपने शरीर की सूक्ष्म ऊर्जाओं (Energy Channels) के साथ काम कर रहे होते हैं। हमारे शरीर में हजारों नाड़ियां होती हैं, जिनमें प्राण वायु बहती है।

अब एक छोटा सा उदाहरण लेते हैं। मान लीजिए आपके घर में पानी की पाइपलाइन है। अगर उस पाइपलाइन में कचरा जमा हो जाए, तो क्या पानी ठीक से बहेगा? नहीं न? ठीक इसी तरह, जब हम गलत मल-मूत्र बनाने वाला या भारी भोजन खाते हैं, तो हमारी नाड़ियों में रुकावटें आने लगती हैं।

जब आप कपालभाति या अनुलोम-विलोम प्राणायाम करते हैं, तो शरीर इन रुकावटों को साफ़ करने की कोशिश करता है। लेकिन अगर आप लगातार गलत खाना खाकर और कचरा भरते जा रहे हैं, तो योग का पूरा फ़ायदा आपको कभी मिल ही नहीं पाएगा। सही और हल्का आहार आपकी नाड़ियों को साफ़ रखता है, जिससे साधना के दौरान ऊर्जा का प्रवाह नीचे से ऊपर की तरफ़ बहुत आसानी से होता है।

मिताहार: कितना खाएं और कैसे खाएं?

योग में सिर्फ़ यह जरूरी नहीं है कि आप 'क्या' खा रहे हैं, बल्कि यह भी उतना ही जरूरी है कि आप 'कितना' और 'कैसे' खा रहे हैं। इसके लिए योगियों ने एक बहुत ही खूबसूरत शब्द दिया है—**मिताहार**। इसका सीधा सा मतलब है संतुलित और सीमित मात्रा में भोजन करना।

मुझे लगता है हम में से ज्यादातर लोग तब तक खाते रहते हैं जब तक कि पेट गले तक न भर जाए। शादी-पार्टियों में तो खैर पूछिए ही मत! लेकिन योग कहता है कि अपनी भूख को चार हिस्सों में बांटो:

* दो हिस्से (50%) पेट को ठोस भोजन से भरो।

* एक हिस्सा (25%) पानी या तरल पदार्थों के लिए छोड़ो।

* और आखिरी एक हिस्सा (25%) हवा के लिए खाली छोड़ दो, ताकि खाना आसानी से पच सके।

जब आप पेट में थोड़ी जगह खाली छोड़ते हैं, तो शरीर को उसे पचाने में ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती। आपकी बची हुई ऊर्जा का इस्तेमाल आपका दिमाग गहरी सोच और साधना में कर पाता है।

भोजन करने का तरीका: माइंडफुल ईटिंग

अब अधिक समय न लेते हुए आगे बढ़ते हैं और एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात पर चर्चा करते हैं—खाना खाने का हमारा तरीका।

आजकल का एक कड़वा सच यह है कि हम खाना कम खाते हैं और यूट्यूब के वीडियो या नेटफ्लिक्स की वेब सीरीज ज्यादा देखते हैं। हाथ में रिमोट या मोबाइल होता है और मुंह में निवाला। हमें पता ही नहीं चलता कि हमने कब में तीन की जगह चार रोटियां खा लीं और स्वाद कैसा था।

योग हमें सिखाता है 'माइंडफुलनेस' यानी सजगता। जब आप खाना खाएं, तो पूरे सम्मान और शांति के साथ खाएं।

* टीवी और मोबाइल को बिल्कुल दूर रख दें।

* खाने के रंग को देखें, उसकी खुशबू को महसूस करें।

* हर निवाले को कम से कम 32 बार चबाएं।

जब आप शांत मन से, चबा-चबाकर खाते हैं, तो आपके मुंह की लार (Saliva) खाने में अच्छी तरह मिल जाती है, जिससे आधा पाचन तो मुंह में ही हो जाता है। इसके अलावा, जब आप खुश होकर खाना खाते हैं, तो शरीर में अच्छे हार्मोन्स बनते हैं, जो उस भोजन को अमृत बना देते हैं। वहीं, अगर आप गुस्से में, तनाव में या टीवी पर कोई क्राइम थ्रिलर देखते हुए खा रहे हैं, तो अच्छा-भला सात्विक भोजन भी शरीर में जाकर जहर की तरह काम करता है।

## एक छोटी सी शुरुआत जो आपकी जिंदगी बदल देगी

अगर आप अपनी योग साधना को गहरे स्तर पर ले जाना चाहते हैं, तो आपको अपनी रसोई में बहुत बड़े बदलाव करने की जरूरत नहीं है। बस छोटी-छोटी चीजों से शुरुआत कीजिए।

सबसे पहले, डिब्बाबंद और फ्रोजन फूड को टाटा-बाय-बाय कहिए। कोशिश करें कि खाना बनने के ३ घंटे के भीतर उसे खा लिया जाए। बाजार के रिफाइंड तेल की जगह कच्ची घानी या शुद्ध घी का इस्तेमाल शुरू करें। खाने में हरी मिर्च, अदरक और सेंधा नमक जैसी प्राकृतिक चीजों को जगह दें।

आप खुद महसूस करेंगे कि कुछ ही दिनों में आपकी फ्लेक्सिबिलिटी (शरीर का लचीलापन) बढ़ जाएगी। जो आसन पहले करने में दर्द होता था, वो अब आसान लगने लगेगा। सुबह उठते ही जो भारीपन लगता था, उसकी जगह एक नई ताजगी ले लेगी।

आखिर में बस इतना ही कहूंगा कि हमारा शरीर एक मंदिर है और भोजन उसकी आहुति। इस मंदिर में पवित्र चीजें ही चढ़ाएं ताकि आपके भीतर की साधना की अग्नि हमेशा जलती रहे। अगली बार जब आप अपनी थाली के सामने बैठें, तो एक पल के लिए रुकें, भोजन को धन्यवाद दें और फिर पूरे होश के साथ खाएं। खुद में बदलाव आप साक्षात देखेंगे!