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घेरंड संहिता में प्राणायाम के लाभ और विधियाँ
घेरंड संहिता में प्राणायाम को 'पंचम उपदेश' में विस्तार से समझाया गया है। जानें 8 प्रकार के कुम्भक, उनके लाभ और प्राणायाम के लिए आवश्यक शर्तें जैसे स्थान, काल, मिताहार और नाड़ी शुद्धि।घेरंड संहिता में प्राणायाम के लाभ और विधियाँ
साधना विज्ञान
Rajesh Kumar
3/3/20261 मिनट पढ़ें


घेरंड संहिता में प्राणायाम को 'पंचम उपदेश' (पांचवें अध्याय) में विस्तार से समझाया गया है। महर्षि घेरंड के अनुसार, प्राणायाम से शरीर में 'लाघव' (हल्कापन) आता है। यहाँ प्राणायाम को सीधे शुरू करने के बजाय पहले स्थान, काल, मिताहार और नाड़ी शुद्धि पर जोर दिया गया है।
घेरंड संहिता में कुल 8 प्रकार के कुम्भक (प्राणायाम) बताए गए हैं:
1. सहित (Sahita)
यह दो प्रकार का होता है: सगर्भ (मंत्र के साथ) और निगर्भ (बिना मंत्र के)।
इसमें पूरक, कुम्भक और रेचक के दौरान बीज मंत्रों का मानसिक जप किया जाता है।
यह नाड़ियों की शुद्धि और आध्यात्मिक जागृति के लिए सर्वोत्तम माना जाता है।
2. सूर्यभेदी (Suryabhedi)
विधि: दाहिनी नासिका (सूर्य स्वर) से सांस लेना, यथाशक्ति रोकना और फिर बाईं नासिका से बाहर निकालना।
लाभ: यह शरीर में गर्मी बढ़ाता है, जठराग्नि को तीव्र करता है और वात दोषों को दूर करता है।
3. उज्जाई (Ujjayi)
विधि: दोनों नासिकाओं से इस प्रकार सांस लेना कि कंठ (गले) से घर्षण की ध्वनि उत्पन्न हो।
लाभ: यह कफ संबंधी रोगों को दूर करता है, जलोदर (dropsy) में लाभकारी है और शरीर की धातुओं को शुद्ध करता है।
4. शीतली (Shitali)
विधि: जीभ को नली (tube) की तरह मोड़कर बाहर निकालना और उससे सांस खींचना, फिर नाक से रेचक करना।
लाभ: यह शरीर को शीतलता प्रदान करता है, पित्त, अपच और प्यास को शांत करता है।
5. भस्त्रिका (Bhastrika)
विधि: लोहार की धौंकनी की तरह वेग के साथ सांस लेना और छोड़ना।
लाभ: यह तीनों दोषों (वात, पित्त, कफ) का संतुलन बनाता है और कुंडली जागरण में सहायक माना जाता है।
6. भ्रामरी (Bhramari)
विधि: पूरक के बाद कुम्भक करना और रेचक करते समय भंवरे जैसी गूंज (humming) पैदा करना।
लाभ: इससे मन को असीम आनंद और शांति मिलती है, साथ ही मानसिक तनाव दूर होता है।
7. मूर्च्छा (Murccha)
विधि: कुम्भक करने के बाद मन को भ्रूमध्य (तीसरी आंख) में स्थिर करना और इंद्रियों को विषयों से हटा लेना।
लाभ: इससे साधक का मन मूर्छित (शांत) होकर सुख का अनुभव करता है।
8. केवली (Kevali)
विधि: यह वह अवस्था है जहाँ पूरक और रेचक के बिना ही सांस स्वतः रुक जाती है। इसे सिद्ध करना योग की उच्चतम अवस्थाओं में से एक है।
लाभ: इसके सिद्ध होने पर साधक के लिए तीनों लोकों में कुछ भी दुर्लभ नहीं रहता।
प्राणायाम से पहले की अनिवार्य शर्तें:
घेरंड संहिता में स्पष्ट निर्देश है कि प्राणायाम का अभ्यास तब तक न करें जब तक ये चार चीजें व्यवस्थित न हों:
स्थान: पवित्र और शांत जगह।
काल (समय): वसंत या शरद ऋतु में अभ्यास शुरू करना सबसे अच्छा है।
मिताहार: सुपाच्य और सात्विक भोजन (पेट का 1/4 हिस्सा खाली छोड़ना)।
नाड़ी शुद्धि: प्राणायाम से पहले नाड़ियों का शुद्ध होना अनिवार्य है।
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